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एहसासों के दायरे बदल के देखता हूँ !

अपने एहसासों के दायरे बदल के देखता हूँ
सूरज की तरह में भी ढल के देखता हूँ ,
मुसाफिर हूँ यारो इसलिए सपने
मै भी सफर के देखता हूँ ,
एहसासों के दायरे बदल के देखता हूँ !
एक चेहरा है जो मेरे एहसासों मै
दफ़न हो गया है ,
तस्वीरों को रोज न जाने क्यों
बदल के देखता हूँ ,
सुना है इसी गली मै रहता है
वो अफसाना मेरा ,
क्या पता मुक्कमल हो जाये आरजू मेरी
कुछ दूर इस तरफ चल के देखता हूँ ,
अपने एहसासों के दायरे बदल के देखता हूँ
सूरज की तरह में भी ढल के देखता हूँ
मुसाफिर हूँ यारो इसलिए सपने
मै भी सफर के देखता हूँ !
     लेखक
संकल्प साग़र गौर
(बनाइये लफ़्जो से दिल का रिश्ता ) 

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