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बेमतलब सी कविता ज़रूरी तो नहीं !

 सुनसान सड़क
अकेली रात और मैं
चारों तरफ़ सन्नाटा
अचानक मम्मी की कॉल और
वो कह रही है
साथ लेते आना
दो किलों आटा
कितनी अज़ीब बात लगती है
हर बात ज़रूरी हो
ये ज़रूरी तो नहीं !
कभी कभी दिल का हाल
किसी से कहने को बहुत मन करता है
लेकिन उस इन्सान को ढ़ूढ़ना
इतना आसान भी नहीं होता
और उसे बता कर
अपने दिल की बात
क्या होगा???
क्या दिल हमेशा के लिये
हल्का हो जायेगा ???
नहीं कभी नहीं....................
हाँ बिल्कुल भी नहीं ......
मेरे ख़्याल से अपने गम की नुमाइश करना ज़रूरी तो नहीं किसी को दिल का राज़ बताना ज़रूरी तो नहीं !
कभी कभी कुछ लोग
अक्सर टोक देते हैं
ख़ुद को बड़ा बताकर
 छोटों को बीच में रोक देते हैं
माना उम्र में तुम हमसे बड़े हो
 हम जब घुटनों पर थे
तुम अपने पाँव पर खड़े थे लेकिन
रिश्तों की बेकद्री
तुमने ही शुरू की थी
आज घर टूट चुका है
 घर के आँगन मे बड़ी
सी दीवारें
खींची जा चुकी है
शायद बच्चों के आने जाने से
 ये दीवारें छोटी हो जायें
इन दीवारों के पार जाने पर
बच्चों को टोकना ज़रूरी तो नहीं .....?
हाँ बिल्कुल नहीं ज़रूरी नहीं !
संकल्प साग़र ग़ौर
( बनाइयें लफ़्जों से दिल का रिश्ता )बेमतलब सी कविता ज़रूरी तो नहीं !

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